Monday, March 22, 2010

पानी : एक

जितनी ज़रुरत थी
दरख़्तों ने उतना ही लिया
पानी
परिन्दों ने भी प्यार से
सिर्फ उतना ही पिया पानी
किसी ने नहीं तोड़ा
धरती और आसमान का भरोसा
सिवाय हमारे.

पानी : दो

सिर्फ रेत बची है
नदी के पास
कुएँ के पास
कुछ कहानियाँ
पानी ही पानी है
बाज़ार और विज्ञापनों में
एक शब्द भर
बचा है पानी.

Sunday, March 21, 2010

परिभाषाएँ

पहले जैसी नहीं रहीं
अब परिभाषाएँ
सरल और सहज
संज्ञा, सर्वनाम की तरह
कि किसी ने पूछा
और झट से बता दी
अब तो हथियारों के साये में
शान से चलती हैं परिभाषाएँ
परिभाषा पूछी
तो गोली चल जायेगी
और गोली के बाबत सवाल किया
तो परिभाषा बता दी जायेगी.

सखेद

सखेद
लौट आई कविता
कवि ने नहीं देखी दिल्ली
वह दिल्ली घूम आई
यात्रा की थकान थी उसके चेहरे पर
और धूप ने उसका रंग
थोड़ा और साँवला कर दिया था
नींद से बोझिल पलकों से
उसने मुझे देखा
वह मुझे और भी ख़ूबसूरत लगी.

यात्रा के दौरान

जंज़ीरों से बंधे हैं
सूटकेस
सिरहाने रखे हुए हैं
जूते
बर्थ से चिपके हुए हैं
जिस्म
संशय और अविश्वास के अंधेरे में
झपक रही है
नींद
ट्रेन चल रही है.

समय : एक

घड़ी के काँटों पर
सवार हैं वे
अंकों को रौंदते हुए
तारीखें बदल रहे हैं.

समय : दो

बड़ा विचित्र समय है
एक आदमी
जो ईमानदारी से पेट पाल रहा है
अपना और परिवार का
सोचता है
कहीं वह अहसान तो नहीं कर रहा
अपने देश और समाज पर
अंधेरे से लथपथ चेहरे हैं
उसके आसपास
और इन सबके बीच
वह जुगनू की तरह
जल-बुझ रहा है.

मिट्टी के लोग...

महीनों इंतज़ार किया
जिस बारिश का
जब वह आई
तो भीगने से मना कर दिया सबने
बारिश के खिलाफ सड़कों पर निकल आये
छाते और रेनकोट
पानी से बचने के लिए
दुकानों के अहातों और दरख़्तों के नीचे
ठिठक कर खड़े हो गए
मिट्टी के लोग.

कस्बे का कवि...

ख़तरे से खाली नहीं है
किसी छोटे कस्बे में कवि होना
शादी-ब्याह की मनुहार पत्रिका से लेकर
चिरकुटों के अभिनंदन-पत्रों तक
सबसे जूझना पड़ता है -
अकेले नहीं खेला जाता यहाँ
कविता का कोई भी खेल
खो-खो, कुश्ती या लुका-छिपी
थोड़े ही सही
हर खेल में मौजूद रहते हैं दर्शक
गिरेबान पकड़ने के लिए...
कविताओं के बाद शराब पीकर
आत्मसंघर्षों काकाव्यपाठ नहीं होता
कस्बे के बाज़ार में
संघर्ष सिर्फ दिखते हैं
बिकते नहीं हैं...
आपके शहर का पता नहीं
परंतु इस कस्बे में आज भी
घूमता रहता है लौंजाइनस*
अपनी मूँछें उमेठते हुए.

*ग्रीक चिंतक और आलोचक; जिसने लिखा : 'जिनकी आत्माएँ क्षुद्र होती हैं, उनके विचार भी उतने ही क्षुद्र होते हैं'

Tuesday, March 9, 2010

वैवाहिक विज्ञापन

कहानी की तरह होते हैं
लड़कियों के वैवाहिक विज्ञापन
कहानी की तरह
होते हैं इनमें चरित्र
रिटायर्ड बाप
नौकरी तलाशता भाई
प्रतियोगिता की तैयारी करती छोटी बहन
पूजा घर में बैठी हुई माँ
और दुबली-पतली साँवली-सी
एक उदास नायिका
कहानी की तरह
चलती रहती है ज़िंदगी
और कहानी की तरह ही
मोड़ आते हैं ज़िंदगी में
किसी दिन
किसी एक सुबह
आता है डाकिया
और कुछ चिठ्ठियाँ दे जाता है
चिठ्ठियाँ जिनके भीतर
बंद होती है हैवानियत
और जन्म-चक्रों में बैठे हुए पापी ग्रह
काँपते हाथों से
लिफाफा खोलते हैं पिता
दिल धड़कने लगता है माँ का
समाज शास्त्र की पुस्तक बंद कर देती है बहन
और खिड़की से बाहर
देखने लगती है नायिका
गली में घूमते सूअर के बच्चों को
लिफाफा खोलते ही
घर में भर जाती है
एक अजीब सी घुटन, खामोशी
और सड़ांध मारती प्रतीक्षा.

Monday, March 8, 2010

औरतें

धरती के बीचो-बीच
रोप दिया है
तुलसी का एक बिरवा
और परिक्रमा कर रही हैं औरतें
अपनी प्रार्थनाओं में
कामना कर रही हैं
घर की सुख-समृद्धि और शांति की
निर्जला व्रत कर रही हैं
प्रदोष कर रही हैं
दिवंगतों के लिए
ग्यारस कर रही हैं
धरती की खुशहाली के लिए
रतजगा कर रही हैं औरतें
एक कभी न खत्म होने वाली
दौलत है उनके पास
समुद्र हैं कामनाओं के
झरने हैं प्रार्थनाओं के
अथाह जल राशि है
पीपल, बरगद और तुलसी के लिए
चींटियों के लिए शक्कर है
चिड़ियों के लिए चावल के दाने हैं
रोटियाँ हैं गायों के लिए
भूखे देवताओं के लिए भोग है
ऊबे हुए देवताओं के लिए मंगलगान हैं
अंधकार में बैठे हुए देवताओं के लिए
जलते हुए दीप हैं उनके पास
सुख है दुःख के लिए
प्रायश्चित है
पापों के लिए
जन्म-जन्मांतरों के
ढेर सारे पुण्य हैं उनके पास
जो धरती के काम आते हैं
आड़े वक्त.

Friday, February 26, 2010

ईश्वर

सबने शामिल कर लिया है
तुम्हें
अपने-अपने ज़ेहाद में
और तुम्हें पता ही नहीं चला
यार
कैसे अंतर्यामी हो...!

Sunday, October 19, 2008

कस्बे का कवि....!

मैं मणिमोहन, छोटे से कस्बे गंज बासौदा में रहता हूँ... मूलतः कवि हूँ... हिंदी में कविताएँ लिखता हूँ... हिंदी की कुछ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के लिए अनुवाद भी पिछले दिनों किया... हाल ही में तीन कविताएँ कोलकाता से निकलने वाली वागार्थ में भी छपी हैं... कस्बे की तासीर से ज़िंदगी के तमाम रंगों को समेटती कविताएँ अब इस मंच पर ...