Thursday, May 13, 2010

समझौता

रोज़ सुबह आता है दूधवाला

और पानी मिला दूध

जग में डालकर चला जाता है

रोज़ डाँटता हूँ उसे

धमकी देता हूँ दूध बंद देने की

मुस्कुराता है दूधवाला

और रोज़ की तरह

साइकिल की घंटी बजाते हुए

आगे निकल जाता है

रोज़ शुरु होता है दिन

इस छोटे-से

समझौते के साथ.

6 comments:

sangeeta swarup said...

दिन की शुरुआत ही नहीं सारा दिन ही समझौते में बीत जाता है....अच्छी प्रस्तुति

Vikram Rathore said...

बढ़िया लिखा है....

मेरे ब्लॉग पर भी आये (अभी नया नया है)
http://vikramrathaure.blogspot.com

दिलीप said...

shruaat hi kya poora din isi tarah samjhaute me hi nikal jaata hai...

'उदय' said...

...बहुत सुन्दर,प्रसंशनीय रचना !!!

स्वाति said...

सुन्दर प्रस्तुति..

Shailendra Saxena said...

respected Mani bhai,
I think life runs due to compromise.If you believe in compromise you can run other wise......?
I am intrested to see you at my home on my Computer.
Regards.
Shailendra Saxena "Sir"
Ascent English Speaking Coaching
Ganj Basoda. 09827249964.