Monday, July 26, 2010

शुद्ध घी के बहाने

ठेठ देहात से आया है
एक देहाती
शहर में शुद्ध घी बेचने
भीड़ जुटी हुई है
उसके इर्द-गिर्द
तरह-तरह से
उसके घी को परख रहे हैं लोग
सवाल कर रहे हैं
तरह-तरह के
हर सवाल के जवाब में
एक ही बात कह रहा है देहाती
घर का घी है बाबू जी
मजबूरी है
इसलिए बेच रहा हूँ
वरना हमारे घर में
दूध-घी बेचा नहीं जाता
कटघरे में खड़े
बेगुनाह आदमी की तरह
बार-बारएक ही बात
दोहरा रहा है देहाती
गाँव से चलते वक्त
उसने नहीं सोचा होगा
कि इतना कठिन होगा
शहर में शुद्ध घी बेचना
किसी को यकीन नहीं आ रहा
उसकी बात पर
यकीन आये भी तो कैसे
मिलावट की इस दुनिया में
यकीन उस डालडा का नाम है
जिसे खाते-खाते
लोग शुद्ध घी की
पहचान तक भूल गये हैं.

3 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

...bahut sundar !!!

aarkay said...

"कद्र दानो की तबीयत का अजब रंग है आज
बुलबुलों को है यह हसरत कि हम उल्लू न हुए "

Rajput said...

आज अनायास आपके ब्लॉग में घुस गया तो सब कुछ पढ़कर ही बार आया
बहुत खुबसूरत लिखा है आपने | बहुत बड़ी बात चाँद शब्दों में बांधने का हुनर आप में बहुत है |