Friday, June 18, 2010

दोस्तों के बारे में

कौन समझ सका है
दोस्तों को
सिवाय दोस्तों के
आवारा छोकरों का एक झुण्ड
जो बेझिझक घुस जाता है
घरों में
जैसे हवा के साथ
घर में भरा जाते हैं
पीले पत्ते
कोई वक्त नहीं है
उनके आने का
सुबह, दोपहर, शाम या रात
कभी भी धमक जाते हैं
बिना दरवाज़ा खटखटाये
बहुत जल्दी में हुए
तो सड़क पर ही खड़े होकर
पुकारने लगते हैं
अपने दोस्तों को
उनके घर के नाम से
कुछ भी अलग नहीं है उनका
सब-कुछ अलग होते हुए भी
कपड़ों की
इतनी अदला-बदली होती है
आपस में
कि कोई नहीं जानता
किसके पास
कितने कपड़े हैं
परेशान हैं माँ-बाप
अपने घर के सुख-दुःख
उनसे कैसे छुपायें
एक साथ
उदास होते हैं वे
एक साथ
चमकती है
उनके चेहरों पर खुशी
सबकी अपनी
एक अलग दुनिया है
फिर भी शामिल हैं वे
एक-दूसरे की दुनिया में.

9 comments:

'उदय' said...

...बेहद प्रभावशाली रचना,बधाई!!!!

Maria Mcclain said...

nice post, i think u must try this website to increase traffic. have a nice day !!!

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर उम्दाभावमय कविता है शुभकामनायें

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढिया रचना है|एक यथार्त चित्र प्रस्तुत कर दिया आपने। बधाई स्वीकारें।

vipinkizindagi said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

DEEPAK BABA said...

bahut hi sunder kavita.
bahut kuch kah jati hai
kuch apna bachpan bhi yaad kara deti hai
kuch chhote bhai - bhatijon ki yaad dila jati hai

Sunil Deepak said...

पढ़ कर गुज़रे दिन याद आ गये! धन्यवाद.

aarkay said...

ऐसी बेतकल्लुफी केवल स्कूल- कालेज के दिनों में ही संभव है . बाद में तो दोस्ती में भी हानि-लाभ का गणित आ जाता है.
बहुत सुंदर कविता!

vinay said...

यथार्थ का चित्रण करती सुन्दर कवीता ।