Friday, June 18, 2010

दोस्तों के बारे में

कौन समझ सका है
दोस्तों को
सिवाय दोस्तों के
आवारा छोकरों का एक झुण्ड
जो बेझिझक घुस जाता है
घरों में
जैसे हवा के साथ
घर में भरा जाते हैं
पीले पत्ते
कोई वक्त नहीं है
उनके आने का
सुबह, दोपहर, शाम या रात
कभी भी धमक जाते हैं
बिना दरवाज़ा खटखटाये
बहुत जल्दी में हुए
तो सड़क पर ही खड़े होकर
पुकारने लगते हैं
अपने दोस्तों को
उनके घर के नाम से
कुछ भी अलग नहीं है उनका
सब-कुछ अलग होते हुए भी
कपड़ों की
इतनी अदला-बदली होती है
आपस में
कि कोई नहीं जानता
किसके पास
कितने कपड़े हैं
परेशान हैं माँ-बाप
अपने घर के सुख-दुःख
उनसे कैसे छुपायें
एक साथ
उदास होते हैं वे
एक साथ
चमकती है
उनके चेहरों पर खुशी
सबकी अपनी
एक अलग दुनिया है
फिर भी शामिल हैं वे
एक-दूसरे की दुनिया में.

26 comments:

'उदय' said...

...बेहद प्रभावशाली रचना,बधाई!!!!

Maria Mcclain said...

nice post, i think u must try this website to increase traffic. have a nice day !!!

निर्मला कपिला said...

बहुत सुन्दर उम्दाभावमय कविता है शुभकामनायें

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढिया रचना है|एक यथार्त चित्र प्रस्तुत कर दिया आपने। बधाई स्वीकारें।

vipinkizindagi said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति

DEEPAK BABA said...

bahut hi sunder kavita.
bahut kuch kah jati hai
kuch apna bachpan bhi yaad kara deti hai
kuch chhote bhai - bhatijon ki yaad dila jati hai

Sunil Deepak said...

पढ़ कर गुज़रे दिन याद आ गये! धन्यवाद.

aarkay said...

ऐसी बेतकल्लुफी केवल स्कूल- कालेज के दिनों में ही संभव है . बाद में तो दोस्ती में भी हानि-लाभ का गणित आ जाता है.
बहुत सुंदर कविता!

vinay said...

यथार्थ का चित्रण करती सुन्दर कवीता ।

S.M.MAsum said...

Dooston ke naam paighaam zara dekh lein.
http://aqyouth.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

bundeli said...

Maujooda parivesh ke yatharth ko yade kareene se paros diya hai, bahut jiwant chtran ke liye nissandeh sadhuwad ke patra hain aap. apni aag ko prakhar rakhiye.

kapil said...

बहुत ही शानदार रचना | पढ़कर मजा आ गया |

Anukampa said...

Bohat bhadiya...kaafi dino baad blogvani padha aur apka post sabse pehle..kuch purane dost yaad gaye jo aajkal kho gaye hain is raftaar bhari zindagi mein

kishlay said...

Aapki Kavita Pdkar Anand Aaya. Aage bhi aur acchi kavita padne ko milegi, Badhai!!!!!!!!!!!!!!!!

बदायूनी said...

bahut sunder kavita hai

Latest Bollywood News said...

Very Very Nice Blog Thanks for sharing with us

prerna said...

dosti k naam say ..turant hi pad dali...chale aate h hawa k sath...bachpan tak hi semit rahey ye hawa k jhonke....

prerna said...

dosti k naam say ..turant hi pad dali...chale aate h hawa k sath...bachpan tak hi semit rahey ye hawa k jhonke....

prerna said...

dosti k naam say ..turant hi pad dali...chale aate h hawa k sath...bachpan tak hi semit rahey ye hawa k jhonke....

Personal loan said...

very nice post

Yatri said...

Achchi rachna hai..parantu ab to aisi dosti bhi durlabh hoti ja rahi hai...aapne shayad apne purane dino ko smaran kiya hai..
khair, achchi kavita ke liye sadhuvad!!

veer singh said...

nice poem

veer singh said...

bahut hi sunder kavita

पियूष अग्रवाल said...

क्या खूब लिखा है, आखिर वह दोस्त ही तो हैं जो इस उलझी ज़िन्दगी को सुलझाते हैं. ऐसे ही लिखते रहिये :)

राजीव उपाध्याय said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति। एक निवेदन है कि अगर संभव तो पोस्टों का फोण्ट साइज़ बढ़ा दीजिए, पढ़ने में आसानी रहेगी पाठकों को।